Friday, 25 December 2015

पथिक

हातोंमे जलता दिप लिए
अँधियारेसे जो चला पथिक,
चढती राते,बिखरते सपने
तममाया की प्रतिबिंबसे
भरमाई किस्मत की आँखे
घटाई काली छाये कितनी?
तूफानोंने डाला डेरा,
दिप संभाले,तत्व ना छोड़े,
यात्री करता रहा उजियारा
देख के उस दिप की ज्वाला
हजारों और ललकार उठे,
तेजपुंज ओज की आभासे
सवेरे नव साकार हुए।
'अटल' अविचल निश्चयसे उसके
आज दशोंदिशाए उजागर हैं,
कभी दिप लिए भटकता यात्री
आज सहस्त्ररश्मी नवभास्कर हैं ।।©
                                              -निखील


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